रणदीप का परिणाम- "नारी- पक्षपात"
समाज के मूल्यों की प्रकृति का पक्षपाती हो जाना" मन की व्यग्रता उद्वेलित होने की पराकाष्ठा पर पहुँचे इससे अच्छा है कहि लिख , बोल लिया जाए। अब विषय पर आते है - देखिए जी तराजू में दोष पैदा किया जा सकता है किन्तु तराजू का प्रयोग इस आधार पर तो बन्द नहीं किया जा सकता कि उसमें विकार उत्तपत्र हो जाते हैं। लेकिन नियत तो उसकी भी देखी जानी चाहिए जो तराजू को उठा कर सामग्री तौलता है!! लेकिन जब ग्राहकों को यह अधिकार ही न दिया जाए कि वह तराजू के पड़ले के कम ज्यादा होने पर आवाज ही नहीं उठा सकते तब निःसन्देह ही तराजू का प्रयोग क्यों किया जाए इस बात में बजन आ जाता है। अब यहां पोस्ट में तराजू का अर्थ "समाज" से है जिसका एक पलड़ा स्त्री तो दूसरी पड़ला पुरुषों का है। और "जो तराजू हाथों से पकड़े है वह है "पुरुषवाद" का। अब बात आगे बढ़ाऊ उससे पहले यह स्पष्ट कर दूं कि यह पोस्ट उस फर्जी नारीवाद का फिजूल का रोना, रोना भी नहीं है जो नारी नाम पर "अतार्किक" सहानुभूति रखे। " यह जरूरी नहीं स्त्रित्व का गुण हर स्त्री में मजूद ही हो।" अब मैं यहां सिलसिले बार तरीके से उन प्...